महात्मा गांधी के जीवन की कहानी | Mahatma Gandhi Biography

महात्मा गांधी जिन्हें लोगों प्यार से बापू कहकर पुकारते थे वह एक साधारण से दिखने वाले व्यक्ति थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन अपने सिद्धांतों के आधार पर व्यतीत किया और आज हम सबके लिए एक सिद्धान्त है। आज हम उस महापुरुष के जीवन की कहानी पढ़ने वाले है जिसने हमारे देश को आज़ाद करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसके फलस्वरूप आज हम आज़ाद भारत में आज़ादी से सांस ले रहे है –Mahatma Gandhi

अपने ऊपर हिंसा के अत्याचारो को सहन किया और अहिंसा के मार्ग पर चलकर इन्होंने भारत को आज़ादी दिलाई “अगर आपके एक गाल पर कोई तपड़ मारे तो अपना दूसरा गाल आगें कर देना जिसे उसे अपनी ग़लती का अहसाह हो” ऐसे थे हमारे बापू-Mahatma Gandhi

Mahatma Gandhi Biography महात्मा गांधी History Hindi

महात्मा गांधी हमारे देश के साथ दूसरे कई देशों में भी प्रसिद्ध है इसलिए विभिन्न देशों में महात्मा गांधी की मूर्तियां स्थापित है। हमारे देश की 72 साल की आज़ादी के बाद भी महात्मा गांधी के सिद्धांत हमारे साथ मौजूद है क्योंकि हमें बचपन से सिखाया जाता है कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो,

हमारे देश के हर नोट पर जो विध्यमान है, अहिंसा के पुजारी, जिन्हें हम बापू कहते है और हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन के बारे में जाना हमारे लिए एक प्रेणा और उनके जीवन से बहुत कुछ सीखने का अवसर प्रदान करता है। यह हमारा एक प्रयास है जो आपको महात्मा गांधी के जीवन से अवगत करता है।

महात्मा गांधी के जीवन की कहानी – Mahatma Gandhi Biography

  • Name – Mohandas Karamchand Gandhi
    • Date of Birth – 2 October 1869
    • Place of Birth – Porbandar (Gujarat)
    • Father Name – Karamchand gandhi
    • Mother Name – Putli bai
    • Wife Name – Kasturba Gandhi
    • Children – Harilal, Manilal, Ramdas, Devdas
    • Death – January 30, 1948

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था इनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के एक शहर पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ। महात्मा गांधी के पिता का नाम करमचन्द गांधी और माता का नाम पुतलीबाई था।

महात्मा गांधी करमचन्द गांधी की चौथी पत्नी पुतलीबाई के पुत्र थे। इसे पहले उनकी तीनों पत्नियां प्रसव के समय मर गई थी। महात्मा गांधी के पिता उस समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान थे और माता धार्मिक विचारों वाली महिला थी। गांधी जी पर उनकी माता का बहुत प्रभाव पड़ा इसलिए गांधी जी ने अपनी माता को दिए वचन के अनुसार हमेशा शाकाहारी जीवन अपनाये रखा।

गांधी का अर्थ गुजरती भाषा में पंसारी होता है और बापू को गुजरती भाषा में पिता कहा जाता है। गांधी को पहली बार महात्मा गांधी राजवैद्य जीवराम कालिदास ने संबोधित किया था और फिर उन्हें महात्मा गांधी के नाम से पुकारा जाने लगा। सुभाष चन्द्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज़ के सैनिकों के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ के लिए रंगून रेडियो से उन्हें राष्ट्रपिता कहकर पुकारा था तो इस प्रकार महात्मा गांधी को अलग-अगल लोगों द्वारा अनेक नाम दिए गये थे।

महात्मा गांधी का प्रारम्भिक जीवन – Mahatma Gandhi (1876-1888 तक)

महात्मा गांधी ने अपनी मिडिल की पढ़ाई पोरबंदर से प्राप्त की और 1876 में उनका परिवार राजकोट आ गया जहाँ से 1881 में उन्होंने अपने हाई स्कूल की परीक्षा को पास किया। महात्मा गांधी उस समय एक औसत छात्र थे।

1883 में जब महात्मा गांधी 13 वर्ष के हुए तो उनका विवाह कस्तूरबा माखनजी से कर दिया गया जो 14 वर्ष की थी। उस समय बाल विवाह की रीति रिवाज थे इसलिए यह एक बाल विवाह था। कस्तूरबा माखनजी के लंबे नाम को छोटा करके कस्तूरबा रखा गया जिसे लोग बा कहकर पुकारते थे।

1885 में महात्मा गांधी की पहली सन्तान ने जन्म लिया परन्तु वह कुछ समय तक जीवित रहने के बाद उसकी मृत्यु हो गयी और इसी साल जब गांधी जी 16 साल के थे तब उनके पिता की तबीयत बहुत ख़राब होने लगी जिनकी आयु 63 वर्ष थी। उस समय गाँधी जी हमेशा उनके साथ रहते थे।

परन्तु एक दिन कुछ समय के लिए शरीर को राहत देने के लिए शयनकक्ष पहुंचे जहाँ उनकी शारीरिक अभिलाषाएं जागृत हुई और उन्होंने अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ प्रेम सम्बंध बनायें जिसके कुछ समय बाद उन्हें पता लगा की उनके पिता की मृत्यु हो गयी है जिसे गांधी जी को अपराध की तरह लगा इस घटना से महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य की और मुड़ने लगे थे। इस साल 1885 में गाँधी जी को दो बड़े दुःखों का सामना करना पड़ा एक उनकी पहली सन्तान और दूसरे उनके पिता जी का देहांत।

1887 तक आते-आते महात्मा गांधी ने अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी कर ली और इसके बाद उन्होंने शामलदास कॉलेज भावनगर में प्रवेश लिया और कुछ परेशानियों के चलते उन्होंने एक सत्र बाद उसे छोड़ दिया। उनकी परेशानी का कारण उनके परिवार वाले चाहते थे की वह बैरिस्टर बने क्योंकि वह सबसे अधिक पढ़े लिखें अपने परिवार में इकलौते थे। जो अपने पिता और चाचा की तरह दीवान बन सकते थे

इसलिए उनके परिवारिक मित्र ने सलाह दी की अगर महात्मा गांधी लन्दन से बैरिस्टर बन जाएँ तो वह आसानी से दीवान बन सकते है। इसलिए 1888 में महात्मा गांधी जी यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने गये इस प्रकार गांधी जी बैरिस्टर बने के लिए लन्दन यानि इंग्लैंड गये।

महात्मा गाँधी की संतान और उनका जन्म

1888 में इंग्लैंड जाने से पहले महात्मा गांधी की पहली संतान के रूप में बेटे का जन्म हुआ जिसका नाम हरिलाल गांधी रखा गया। मोहनदास करमचन्द गांधी और कस्तूरबा माखनजी की चार संतानें थी जो सभी पुत्र थे।

-1888 में जन्मे पहले बेटे का नाम हरिलाल गांधी रखा गया।

-1892 में जन्म लेने वाले बेटे का नाम मणिलाल गांधी रखा गया।

-1897 में जन्मे तीसरे बेटे का नाम राम दास गांधी रखा गया।

-1900 में पैदा होने वाले बेटे का नाम देवदास गांधी रखा गया।

महात्मा गांधी की विदेश में शिक्षा और वकालत – Mahatma Gandhi England

उस साल 1888 में महात्मा गांधी अपने जन्मदिन से 30 दिन पहले ही इंग्लैण्ड में यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने गये। भारत से जाने से पहले वह अपनी माता को वचन दे गए की वह हमेशा शाकाहारी भोजन को अपनाये रखेगें और मांस, शराब तथा संकीर्ण विचारधारा का त्याग करेगें।

लंदन में रहते हुए उन्होंने कई तरह के अंग्रेज़ो के रीति रिवाजों का अनुभव किया और अपनी माता के वचन का पालन भी किया। कुछ समय तक शाकाहारी भोजन न मिलने से समस्यओं का सामना किया परन्तु बाद में शाकाहारी भोजन उपलब्ध करने वाले स्थानों के बारे में उन्हें पता लगा और फिर उन्होंने वहाँ शाकाहारी समाज की सदस्यता ग्रहण की।

शाकाहारी समाज के लोगो ने ही उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने के लिये प्रेरित किया। 1891 में जब महात्मा गांधी इंग्लैण्ड से वापस भारत आये तो उनकी माता की मृत्यु हो चुकी थी। इसके बाद उन्होंने बम्बई में वकालत की परन्तु यहां पर उन्हें किसी प्रकार की कोई सफलता प्राप्त नही हुई।

फिर महात्मा गांधी राजकोट आये और वहां पर जरूरतमन्दों के लिये मुकदमे की अर्जियाँ लिखने का काम करने लगें लेकिन कुछ समय बाद कई कारणों से उन्हें ये काम भी छोड़ना पड़ा जिसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्म कथा में किया है। इस प्रकार 1893 एक समझौते के तहत वह एक साल के लिए भारतीय फर्म के लिये केस लड़ने नेटल(दक्षिण अफ्रीका) गये।

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महात्मा गांधी की दक्षिण अफ्रीका की यात्रा और आंदोलन – Mahatma Gandhi (1893-1913)

महात्मा गांधी की दक्षिण अफ्रीका की यात्रा ने ही महात्मा गांधी के जीवन को बदल कर रखा दिया। क्योंकि गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में सेठ अब्दुल्ला का मुकदमा लड़ने के लिए गये थे जहाँ उन्हों देखा वहाँ पर भारतीयों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है और इसके शिकार महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका जाते समय हो चुके थे।

क्योकि जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका जा रहे थे तो उनके पास पहली श्रेणी का टिकट था लेकिन फिर भी उन्हें तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने के लिए कहा गया और जब महात्मा गांधी ने इस बात का विरोध किया तो उन्हें जबरदस्ती स्टेशन पर ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। इस घटना से उनको बहुत आहत पहुँची और वह पूरी रात यही सोचते रहे की क्या उन्हें ऐसे ही यहाँ रहना पड़ेगा या फिर वह भारत वापस लौट जायें और फिर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने का फैसला लिया।

महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका कई बार भारतीयों पर हो रहे भेदभाव का सामना करना पड़ा एक बार गांधी जी घोड़ागाड़ी में यात्रा कर रहे थे तो उनको अंग्रेज यात्री के लिए सीट छोड़ने के लिए कहा गया तो उन्होंने सीट छोड़ने से इंकार कर दिया जिसके कारण उन्हें चालक की मार पड़ी और पायदान पर ही यात्रा करनी पड़ी यहां तक की दक्षिण अफ्रीका के कई होटलों में महात्मा गांधी को जाने से रोका गया इसलिए गांधी जी ने भारतीय समाज के प्रति भेदभाव के ख़िलाफ़ अंग्रेजी साम्राज्य में भारतीयों को सम्मान अधिकार के लिए लड़ाई लड़ने का फैसला किया।

गांधी जी ने अध्ययन करने के बाद यह अनुभव किया कि हमे सबसे पहले एक स्थायी संगठन की आवश्यकता है जो हमारे भारतीयों हितों की रक्षा करें और इस स्थायी संगठन को तुरंत बनाने के लिए उन्होंने नेटाल की विधायिका और ब्रिटिश सरकार के नाम याचिकाएँ लिखीं और उन पर सैकड़ों भारतीयों के हस्ताक्षर कराए। लेकिन वह इसमें सफ़ल नही हो पाये लेकिन इसे भारतीयों के कष्टों को नेटाल, भारत और इंग्लैंड के अख़बारों का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे फिर उन्होंने भारतीय समाज को वहाँ एकजुट किया और उन्हें स्थायी संगठन बनाने के लिए राजी किया जिसके बाद 1894 में उन्होंने ‘नेटाल इंडियन कांग्रेस’ की स्थापना की और उसके सक्रिय सचिव बन गए।

1906 में ज़ुलु जोकि दक्षिण अफ्रीका में था उस पर अग्रेजो ने नए चुनाव कर लागु करने का ऐलान किया जिसके विरोध में वहाँ दो अंग्रेजी अधिकारियों को मार दिया गया जिसके बाद अग्रेजो ने उनके ख़िलाफ़ युद्ध किया तब गांधी जी ने अंग्रेज़ो से कहा कि वह भारतीयों नागरिकों को भी युद्ध में शामिल करे उनका तर्क था अपनी नागरिकता के दावों को कानूनी जामा पहनाने के लिए भारतीयों को युद्ध प्रयासों में सहयोग देना चाहिए।

लेकिन अंग्रेजो ने सेना में भारतीयों को किसी तरह का पद देने की बात को अस्वीकार कर दिया परन्तु वह इस बात के लिए रजामंद हो गए की भारतीय घायल अंग्रेज सेनिको के उपचार लिए स्टेचर पर लाने के लिए स्वैच्छा पूर्वक कार्य कर सकते हैं और इसकी भागदौड़ महात्मा गांधी ने संभाली।

फिर 1906 में ही दक्षिण अफ्रीका में रहने वाली भारतीय जनता के पंजीकरण के लिए ट्रांसवैल सरकार ने विशेष रूप से अपमानजनक अध्यादेश लागु किया। जिसके बाद महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक जनसभा का आयोजन किया गया और अध्यादेश को तोड़ने और उसकी सजा भुगतने की शपथ ली यही से ही सत्याग्रह का जन्म हुआ।

इस आंदोलन के दौरन कई उतार चढ़ाव आते है जिसमे भारतीय जनता ने बहुत से दुखो और कष्टों का सामना अहिंसा के साथ महात्मा गांधी के नेतृत्व में किया। इस आंदोलन के आखरी दौर 1913 में भारतीय लोगों ने काम करना बंद कर दिया जिसे सैकड़ों भारतीयों को जेल डाल दिया गया और उन्हें कई तरह की यातनाएं दी गई जैसे जेल की सजा, कोड़ों की मार और गोली मारने जैसे आदेश दिए गये। जिसके बाद वहां की सरकार की बहुत बदनामी हुई और फिर ब्रिटिश सरकार के दबाव के बाद एक समझौते किया गया जिसपर महात्मा गांधी के साथ सरकार के प्रतिनिधि और जनरल जॉन क्रिश्चियन के द्वारा बातचीत की गयी.आखिरकार समझौता हुआ और भारतीय राहत विधेयक पास हुआ.

महात्मा गांधी का भारत आना – Mahatma Gandhi Return to India 1915

1915 में महात्मा गांधी जी कई सालों के संघर्षों के बाद भारत लौट आये और भारत आने के बाद अंग्रेज़ो के अत्यचार को देखते हुए उन्होंने भारत को आजाद करने के लिए स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेना शुरु कर दिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में अपने विचार व्यक्त करना शुरु कर दिया गांधी जी के विचार उस समय सम्मानित नेता गोपाल कृष्ण गोखले के विचारों पर आधारित थे। गोपाल कृष्ण गोखले को भारत का गोल्डस्टोन कहा जाता हैं। 19 फरवरी 1915 गोपाल कृष्ण गोखले का देहांत हो गया जिसके बाद महात्मा गांधी जी को कांग्रेस का मार्गदर्शक बनाया गया।

महात्मा गांधी ने देश को अंग्रेज़ो से आज़ाद करवाने के लिए अनेकों आंदोलन करें इसलिए गांधी जी के जीवन का अधिकतर समय भारत की आज़ादी के लिए किये गए आंदोलनों में व्यतीत हुआ। महात्मा गांधी के द्वारा भारत में सबसे पहला आंदोलन 1918 में बिहार के चम्पारण और खेड़ा जिले में किया गया जिसको चम्पारन सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह का नाम दिया गया।

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महात्मा गांधी का चम्पारन सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह – Mahatma Gandhi 1918

यह महात्मा गांधी द्वारा 1918 में भारत में चलाया गया पहला आंदोलन था यह आंदोलन अंग्रेज़ो द्वारा भारतीय किसानों पर होने वाले शोषण के विरोध में किया गया था। उस समय अंग्रेज़ो किसानों को नील की खेती कराने के लिए उन्ह पर अत्यचार करते थे और उस फ़सल को एक निश्चित रकम पर ही बेचने के लिए विवश किया जाता था जिसे किसानों का खूब शोषण होता था। किसानों की यह समस्या जब महात्मा गांधी तक पहुँची तो उन्होंने चम्पारन सत्याग्रह करने का फैसला लिया। जिसके कारण गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया अगले दिन कोर्ट के बहार हज़ारो किसान इक्कठा हो गए और महात्मा गांधी जी के समर्थन में नारे लगने लगे जिसके परिमाणस्वरूप महात्मा गांधी को बिना सज़ा सुनाई ही छोड़ दिया गया इस प्रकार गांधी जी ने अपने पहले सत्याग्रह आंदोलन का सफ़लतापूर्वक नेत्त्व किया

उन्ही दिनों गुजरात जिले खेड़ा नामक गांवों में बाढ़ आने के कारण वहाँ के किसानों की पुरे साल की फ़सल ख़राब हो गयी जिसके कारण किसान कर दे पाने में समर्थ नही थे। इसके लिए उन्होंने ब्रिटीश सरकार से प्राथना की उनका कर माफ़ कर दिया जाये। परन्तु ब्रिटीश सरकार ने उनकी किसी बात को माने से मना कर दिया। जिसके बाद महात्मा गांधी जी द्वारा आंदोलन चलाया गया जिसका नाम खेड़ा सत्याग्रह रखा गया जिसके फलस्वरूप किसानों पर लिया जाने वाले लगान की वसूली बंद कर दी। इस तरह महात्मा गांधी द्वारा 1918 में दो आंदोलन चलाये गये जिनको चम्पारन सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है।

महात्मा गांधी का खिलाफत आंदोलन – Mahatma Gandhi 1920

यह आन्दोलन सम्पूर्ण मुसलमानों के द्वारा चलाया गया मुसलमानों का आंदोलन था क्योकि यह मुसलमानों के धर्मगुरु तुर्की के सुल्तान खलीफा से जुड़ा था। दरसल, पहले विश्व युद्ध इंग्लैंड और जर्मनी के युद्ध दौरान तुर्की के सुल्तान खलीफा को बहुत बड़े धर्म संकट का सामना किया। क्योकि राज भक्ति मांग देखते हुए उन्हें अंग्रेजों का साथ देना था और धर्म भक्ति को देखते हुए इंग्लैंड का साथ देना था इसलिए तुर्की के सुल्तान खलीफा ने इंग्लैंड का साथ दिया गया और इस धर्म संकट में अंग्रेजी सरकार ने कहा कि उनकी स्थिति का सम्मान किया जाएगा परन्तु विश्व युद्ध के बाद अग्रेजों ने इसके विपरित किया और उनके सारे अधिकार छीन लियें।

सारे संसार के मुसलमान तुर्की के सुल्तान खलीफा को अपना धर्मगरु मानते थे और पहले विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों मुसलमानों ने अग्रेजो का साथ इस शर्त पर दिया था कि वह मुसलमानों के धर्म और धार्मिक स्थलों की रक्षा करेंगे लेकिन युद्ध के बाद अंग्रेजी सरकार अपने वादों से मुँह फेर लिया। जिसके कारण मुसलमानों में अंग्रेजी सरकार के लिए गुसा बहुत ज्यादा बढ़ गया और मुसलमानों द्वारा चलाये गये इस खिलाफत आंदोलन को महात्मा गांधी द्वारा समर्थन दिया गया। जिसके बाद गांधी जी हिन्दू-मुसलमानों का भरोसा जीता और वह हिन्दू मुसलमानों के नेता बनाये। जिसके बाद महात्मा गांधी ने बहुत बढ़े असहयोग आंदोलन की नींव ऱखी।

महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन – Mahatma Gandhi 1920

भारतीय जनता के अंग्रेजी सरकार के खिलाफ चलाये जाये रहे आंदोलनों से भयभीत होकर अंग्रेज़ो ने एक नया क़ानून मार्च 1919 में पास किया जिसका नाम रॉलेट ऐक्ट रखा गया यह कानून इसलिए लाया गया था ताकि भारत में चलाए जाने वाले आंदोलनों को रौंदा जा सकते इस कानून के अनुसार अब कोई किसी सभा का आयोजन नही कर सकता था। क्योकि अगर ऐसा किया जाता तो उस पर बिना कोई क़ानूनी कार्यवाही किये जेल में बंद किया जा सकता था। यहाँ तक की उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले के बारे में भी नही बताया जायेगा।

उसी समय पंजाब में जलियाँवाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था जहाँ एक शांतिपूर्ण और अहिसंक सभा चल रही थी। इस आंदोलन में बूढ़े, महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। लेकिन अंग्रेजी सरकार के अफसर जनरल डायर ने फौजी कमांडर के साथ उस भीड़ पर अंधादुन्ध गोलियां चलाईं कुछ लोगो ने गोलियों से बचने के लिए वहाँ मौजूद कुंवे में कूद गये इसमें हजार की संख्या में लोग मारे गये इस प्रकार अंग्रेज़ो ने भारतीय लोगों को बहुत ही बेहरमी के साथ रौंदा इस घटना को आज के समय में जालियाँवाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता है।

इस घटना के बाद में पुरे देश में अग्रेजो के खिलाफ बहुत अधिक रोष पैदा हुआ। जिसके विरोध में महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया यह आंदोलन गांधी जी के बाकी आंदोलनों की तरह ही अहिंसा पर ही आधारित था जिसमे भारतीयों के द्वारा अग्रजों का किसी भी तरह से सहयोग नही किया जायेगा।

इस आंदोलन का उद्देश्य अंग्रेजी सरकार को सहयोग नही देना था जिसके अनुसार भारत में अंग्रेज इसलिए राज़ कर रहे है क्योंकि भारतीय द्वारा उनके लिए काम किया जाता है जिसे अंग्रेज फलफूल रहे है। इसलिए अगर अग्रजों को किसी तरह का सहयोग नही किया जाये तो वह अपने आप भारत छोङे पर मज़बूर हो जायेगें। महात्मा गांधी के द्वारा किये गए इस आंदोनल में लोगों ने उनका बढ़ चढ़कर साथ दिया और अंग्रेज़ो की नौकरी, फैक्ट्री स्कुल, कॉलेज, इत्यादि का बहिष्कार कर दिया गया। यहाँ तक की अंग्रेज़ो द्वारा बनाये गए वस्त्रों को जल दिया गया और अपने देश में सूती के कपड़ो को बनाया गया और उन्ही का इस्तेमाल किया गया। भारतीय लोगों के इस आंदोलन से अंग्रेज़ो को बहुत ज्यादा आहत हुई और ऐसा माना जाता है की यह असहयोग आंदोलन उस समय इतने बड़े आंदोलन में बदल चुका था कि भारत को इस आंदोलन के दौरान ही आज़ादी मिल जाती। लेकिन उस समय हुई चौरी-चोरा की हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को खत्म कर दिया अब अंग्रेज यह अच्छी तरह समझ चुके थे की अब उनका भारत में ज्यादा समय तक रहना मुश्किल है।

महात्मा गांधी का सविनय अवज्ञा आंदोलन – Mahatma Gandhi 1930

1930 में महात्मा गांधी ने फिर एक आंदोलन को चलाया जिसका नाम सविनय अवज्ञा आंदोलन रखा गया इस आंदोलन का उद्देश्य अंग्रेजी सरकार द्वारा बनाये जाने वाले सभी कानूनों की तोडना था। क्योकि महात्मा गांधी के द्वारा एक पत्र लिखा गया था जिसमे उन्हने ग्यारह मांगे मांगी थी लेकिन इस पर अंग्रेजी सरकार ने किसी तरह का कोई ध्यान नही दिया गया जिसके बाद 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया गया इस आंदोलन की प्रमुख़ घटना दांडी यात्रा यानि नमक सत्याग्रह है।

महात्मा गांधी की दांडी यात्रा

उस समय अंग्रेजी सरकार ने एक कानून पास किया था जिसके अनुसार समंद्र से नमक बनाना कानून को तोड़ना था। महात्मा गांधी ने इस कानून का विरोध किया और 12 अप्रैल 1930 को अहमदाबाद साबरमती आश्रम से पैदल यात्रा शरू की जो दांडी गुजरात में स्थित नामक स्थान तक चली। यह यात्रा 24 दिनों की थी जिसमे महात्मा गांधी ने 78 स्वहसेवक के साथ शरू की थी जो दांडी तक जाते-जाते हजारों लोगों उनके साथ जुड़ें। वहाँ जाने के बाद गांधी जी ने समंदर के पानी से नमक बनाया

फिर भारत के अगल-अगल स्थानों पर इस प्रकार समंदर से नमक बनाकर इस आंदोलन को चारों तरफ़ फैलाया गया जिसको लोगों द्वारा बहुत सहयोग मिलने के कारण गांधी जी को गिरफ़्तार कर लिया गया और फिर वायसराय लॉर्ड इरविन को समझौते के लिए भेजा था जिसके बाद गांधी जी ने समझौता स्वीकार कर लिया था।

महात्मा गांधी का भारत छोड़ो आंदोलन – Mahatma Gandhi 1942

यह आंदोनल महात्मा गांधी द्वारा चलाया गया तीसरा सबसे बड़ा आंदोलन था जिसने अंग्रेजी साम्राज्य को हिला कर रख दिया। इस समय भारत के हर वर्ग के लोगों अपनी आज़ादी के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुके थे। तब गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन को शरू किया।

महात्मा गांधी जी ने भारत को जल्दी से आजाद करने के लिए इस आंदोलन की शुरुवात की थी। जिसकी पुरे देश ने बहुत बड़ा आंदोलन बना दिया। ऐसा माना जाता है कि इस आंदोलन के बाद अंग्रेज समझ चके थे की अब भारत से जाने का समय आ चुका है। जिसके बाद अंग्रेजी सरकार ने संकेत दे दिए थे की वह भारत के लोगों को देश की बागड़ोर छोडक़र चले जायेंगे।

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महात्मा गांधी का व्यक्त्तिव और सिद्धांत

सत्य

गांधी जी एक ऐसे व्यक्त्तिव थे जो अपने पर ऊपर प्रयोगों से सीखने का प्रयास करते है। भारत के स्वतंत्र सग्राम में उन्होंने हमेशा सत्य और सचाई की खोज की। महात्मा गांधी के इन्ही सिद्धांत के लिए वह देश और दुनिया में विख्यात है।

अहिंसा

गांधी जी ने अपने पूरे सघर्ष के दौरान अहिंसा का मार्ग अपनाया उन्हें अहिंसा के पुजारी के नाम से भी जाना जाता है। महात्मा गांधी कहते है कि मेरे पास मारने की हजारों वहज है परंतु किसी को मारने की कोई वजह नही है।

भारत में होने वाले अनेको आंदोलन में उन्होंने हमेशा अहिंसा के लिए लोगो को प्रेरित किया। अग्रेजो द्वारा हजारो बार अत्यचार करने के बाद भी वह अपने सिद्धांत अहिंसा के मार्ग पर चलते रहे।

शाकाहारी रवैया

ऐसा नही है कि कभी गाँधी जी ने मांस नही खाया वः अपने बचपन के दिनों में मांस खा चुके थे। लेकिन उनकी माता जी बहुत ही धार्मिक थी जिसका उनपर बहुत प्रभाव पड़ा और वह एक जैन समाज के समाज में पले बढ़े थे। और जब वह इंग्लैंड जा रहे थे तो उन्होंने अपनी माता को हमेशा शाकाहारी रहने का वचन दिया था जिसके बाद महात्मा गांधी ने शाकाहारी जीवन को अपनाये रखा।

ब्रह्मचर्य

जब गांधी जी 16 साल के थे तब उनके पिता की तबीयत बहुत ख़राब होने लगी जिनकी आयु 63 वर्ष थी। उस समय गाँधी जी हमेशा उनके साथ रहते थे। परन्तु एक दिन कुछ समय के लिए शरीर को राहत देने के लिए शयनकक्ष पहुंचे जहाँ उनकी शारीरिक अभिलाषाएं जागृत हुई और उन्होंने अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ प्रेम सम्बंध बनायें जिसके कुछ समय बाद उन्हें पता लगा की उनके पिता की मृत्यु हो गयी है जिसे गांधी जी को अपराध की तरह लगा इस घटना से महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य की और मुड़ने लगे थे।

सादगी

महात्मा गांधी हमेशा साधारण जीवन व्यतीत किया। गांधी जी अपने जीवन में बहुत बारे मौन व्रत रखते थे ताकि उनको मन की शांति मिलें। गांधी जी के वेष धारण से उनकी सादगी झलकती थी। वह सूती के बने कपड़े पहनते थे और लोगो को भी इसके लिए प्रेरित करते थे की वह अपने देश में बने कपड़ो का इस्तेमाल करें।

विश्वास

महात्मा गांधी हर धर्म का समान करते थे उनके पूरा विश्वास था की अहिंसा के मार्ग पर चलाकर भारत को आजादी मिल सकती है। इसलिए उन्होंने हमेशा अपने विश्वास पर ही हर आंदोलन में अहिंसा का मार्ग को अपनाया।

तो दोस्तों हमे इस पोस्ट में आपको महात्मा गांधी जी के जीवन के बारे में आपको अवगत करने का प्रयास किया है। हमारे देश के राष्ट्रपिता जिनकी तस्वीर हर नोट पर होती है हमें उनके इस सघर्ष से बहुत कुछ सीखने को मिला है और हमें अपने जीवन में क़ामयाब होने के लिए उन्ह लोगो के बारे में पढ़ना चाहिए जो अपने सघर्ष के लिए आज याद किये जाते है। तो दोस्तों इस पोस्ट को अपने दोस्तों के साथ Share करें और सघर्ष व क़ामयाबी के बारे में सिखाये-(Mahatma Gandhi) 

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